अध्याय 107

समर की नज़र से

मेरी नींद अलार्म की आवाज़ से खुली, जो दिसंबर के अँधेरे को किसी धारदार चाकू की तरह चीरती हुई आ रही थी। साढ़े छह बजे थे। मेरे कमरे के कोने में रखा रेडिएटर खड़खड़ा रहा था और सी-सी की आवाज़ कर रहा था, फिर भी हवा इतनी ठंडी थी कि लगता था जैसे साँस भी दिखाई दे जाएगी। मैं कुछ देर यूँ ही पड़ी...

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